भीष्म एक बहुत जटिल चरित्र तब भी थे और आज भी लगते हैं। उस समय भी विदुर,कृष्ण जैसे लोग ये नही समझ पा रहे थे कि उस युग के इतने बड़े धर्मात्मा दुर्योधन की तरफ से कैसे खड़े हो गए।
1. पिता की आज्ञा मानना सही है पर बाकी समाज की तरफ भी उनकी जिम्मेदारी थी। बूढ़े पिता शांतनु जो एक स्त्री पर आसक्त हो गए थे उनकी लोलुपता को पूर्ण करने के लिए उन्होंने कुछ प्रतिज्ञाएं कर ली। वृद्धावस्था में जैसी संतानें हो सकती थी वैसी शांतनु को हुई जो असमय मृत्यु के गाल में समा गई।
2. भीष्म के माता पिता के सम्बंध साधारण नही थे। माता गंगा ने सात पुत्र नदी में बहा दिए , उनके पैदा होते ही माता पिता अलग हो गए। ऐसे अनुभव के बाद उनके मन मे गृहस्थ जीवन के लिए कोई ज्यादा आकर्षण तो नही बना होगा, (आज भी तलाक लेने वालों के बच्चे शादी के प्रति कोई बहुत अच्छी भावना नही रखते)। इसलिए शायद उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञाएं लेने से पहले नही सोचा।
4. पिता द्वारा इच्छा मृत्यु का वरदान देने की बात हज़म नही होती।शांतनु खुद बुढ़ापे में शादी के चक्कर मे फंसे थे,कोई ऋषि तो थे नही की वरदान दे देते। सभी को पुत्रमोह होता है पर धृतराष्ट्र का दुर्योधन के लिए मोह कुख्यात है। अगर एक मनुष्य का किसी को इच्छा मृत्यु का वरदान देना संभव होता तो धृतराष्ट्र अपने बेटे को ज़रूर दे देता।
5. व्यक्तिगत मोह /विकास से कहीं बड़ा होता है समाज और देश का विकास। भीष्म यही चूक गए, उनके कारण राज्य को लंबे समय तक अच्छा राजा नही मिल पाया। उचित आयु में उनको विवाह करके, राजा बनना चाहिए था जो राजकुमार होने के नाते उनकी जिम्मेदारी थी। राजा दुष्ट दलन और न्याय करने से दूर नही भाग सकता। यही बात कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को समझाई थी कि तुम तो युद्ध से भाग कर हिमालय पर तपस्या में लग जाओगे, हस्तिनापुर की प्रजा का क्या जो दुर्योधन को झेल रही है?
भीष्म भी इसी प्रजा के दोषी थे। सब कुछ छोड़ ही दिया था तो वन में जाकर तपस्या करते,वो तो धृतराष्ट्र और दुर्योधन की ढाल बनकर खड़े हो गए।
कृष्ण जिस धर्म स्थापना की बात करते थे उसके पीछे उद्देश्य यही था कि जनता सुखी रहे नही तो दुर्योधन राजा हो या युधिष्ठिर उनको क्या फर्क पड़ना था।
भीष्म और द्रोण ही दुष्ट दुर्योधन के मजबूत कवच थे। इन्ही के कारण युद्ध लंबा हुआ, भीष्म 10 दिन सेनापति रहे,द्रोण 4 दिन!! इन दोनों के बाद युद्ध 4 दिन भी नही चला।

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