युद्ध के चौथे दिन भीमसेन ने अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए दुर्योधन के सात भाइयों का वध कर डाला था। यह दृश्य देखने के बाद कौरव सेनापति भीष्म ने अपने समस्त सेना को भीमसेन से युद्ध करने के लिए भेज दिया।
इसके बाद कौरव योद्धा भगदत्त और भीमसेन के बीच युद्ध छिड़ गया। भगदत्त ने भीम को अपने बाड़ों से ढक दिया। उन्होंने भीमसेन के सीने में अपने बाड़ों से प्रहार किया। इस प्रहार को भीमसेन सहन नहीं कर सके और मूर्छित हो गए। अपने पिता की पराजय देखर घटोत्कच अत्यंत कुपित हो उठा और मायावी युद्ध करने लगा। संजय धृतराष्ट्र को युद्ध का वृत्तांत सुनाते हुए बोले -
उद्धरण -
महाराज! तत्पश्चात् राजा भगदत्तने कुपित होकर झुकी हुई गाँठवाले बाणसे भीमसेनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।। ५१ ।।
राजा भगदत्तसे इस प्रकार अत्यन्त घायल किये गये महाधनुर्धर महारथी भीमसेनने मूर्च्छासे व्याप्त हो ध्वजका डंडा थाम लिया ।। ५२ ।।
उन सब महारथियोंको भयभीत और भीमसेनको मूर्च्छित हुआ देख प्रतापी भगदत्तने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। ५३ ।।
राजन्! तदनन्तर भीमको वैसी अवस्थामें देखकर भयंकर राक्षस घटोत्कच अत्यन्त कुपित हो वहीं अदृश्य हो गया ।। ५४ ।।
स्रोत : भीष्म पर्व, अध्याय संख्या ६४, व्यास महाभारत
इसके बाद घटोत्कच और उसकी राक्षसी सेना ने भगदत्त को चारों ओर से घेर लिया। तब भीष्म, द्रोण और दुर्योधन भगदत्त की मदद करने पहुंचे। किन्तु घटोत्कच के पराक्रम की पराकाष्ठा को देखकर सेनापति भीष्म को युद्ध से पीछे हटने का निर्णय लेना पड़ा। अतः दिन ढलने के पश्चात् विजय पांडवों की ही हुई।

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