महाभारत का यह प्रसिद्ध प्रसंग आधुनिक मैनेजमेंट की सीख देता है। भीम और हिडिम्बा का पुत्र घटोत्कच अत्यंत शक्तिशाली योद्धा था। वह युद्ध में भाग ले सकता था, लेकिन पांडव उसे अपने हुकुम के इक्के की तरह युद्ध की शुरुआत में ही रणमैदान में नहीं ले गए।
कौरवों ने युद्ध के नियमों को तोड़ दिया और रात में पांडव सेना पर हमला कर दिया। उस समय घटोत्कच को युद्धभूमि में भेजा गया। घटोत्कच अर्धराक्षस होने के कारण रात के अंधेरे में भी पूरी ताकत से युद्ध कर सकता था। कौरव सेना में भारी तबाही मचाते हुए उनके सैकड़ों सैनिकों को मार डाला। एक समय तो द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महान योद्धा भी असहाय महसूस करने लगे।
अंततः कर्ण ने घटोत्कच को मारने के लिए अपने दिव्य अस्त्र का प्रयोग किया। इस हथियार का इस्तेमाल अर्जुन को मारने के लिए किया जा सकता था, लेकिन घटोत्कच ने अर्जुन की जान बचाने के लिए खुद का बलिदान दे दिया। कहा जाता है कि जब घटोत्कच का विशाल शरीर ढह गया तो शत्रु खेमे की एक अक्षौहिणी सेना उसके नीचे दबकर नष्ट हो गई। (हिन्दू विश्वकोश के अनुसार एक अक्षौहिणी 1,09,350 पैदल सेना, 65,610 अश्व दल, 21,870 रथ और 21,870 हस्ती दल के बराबर होती है)
इस घटना से मैनेजमेंट का जो सबक मिलता है, वह यह है कि खुद की बाजी के सभी पन्ने को एक साथ खोलना अल्पावधि में फायदेमंद हो सकता है, लेकिन लंबे समय में हानिकारक भी हो सकता है। हुकूम के इक्के को जल्दबाजी की बजाय सही मौके पर फैंका जाए तो परिणाम खुद की तरफ पलट सकता है।

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