लंकिनी के केवल बेहोश होने की कथा कहाँ मिलेगी? हनुमान जी के जाने के बाद क्या वह जीवित थी?


 लंकिनी का चरित्र मात्र कुछ पंक्तियों के लिए आता है। वो लंका की द्वारपाल थी। असुरों में स्त्रियां भी योद्धा होती थी। ताड़का, शूर्पणखा सेना संभालती थी,लंकिनी प्रहरी थी।

पिछले दिनों बिहार के किसी मूर्ख मंत्री ने रामचरित मानस और तुलसीदास जी के बारे में गलत कहा था। कोरा पर भी कुछ मूर्ख एक सूची ले आये थे कि तुलसीदास जी ने क्या क्या लिखा। उसमें ये चौपाई नही दिखी जिसमें विप्र की बुराई लिखी थी😂

ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं, उभय लोक निज हाथ नसावहिं।

बिप्र निरच्छर लोलुप कामी, निराचार सठ बृषली स्वामी।

खैर, तुलसीदास जी ने लंकिनी का प्रसंग सुंदर तरीके से वर्णित किया है।शब्दों के चयन में तुलसीदास जी अप्रतिम थे👍

जब हनुमान जी को लंकिनी रोक लेती है तो वो उनसे बदतमीजी से बात करती है

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।

वो उनको चोर और सठ(शठ) अर्थात मूर्ख कहती है।

हनुमान जी ने उससे कोई बात नही की,कोई सफाई नही दी। सीधे एक मुक्का मारा।

मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।

इस एक मुक्के से लंकिनी बेहोश हो गई। जब होश में आई तो उसके स्वर बदल गए, फिर वो कहती है

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।

बालकांड में तुलसीदास जी ने लिखा कि तीर्थ में स्नान से काक(कौआ) पिक(कोयल) बन जाता है। वैसे ही हनुमान जी के एक मुक्के से लंकिनी भी कौए से कोयल हो गई। एक लव(क्षण) का सत्संग तीर्थ स्नान के समान है 😃

दरअसल जब लंका बनी तो कुबेर की थी, तब लंकिनी शुद्ध,सात्विक मन की थी। पर जब लंका रावण के कब्जे में आई तो लंकिनी उदास हो गई तब ब्रह्मा जी ने उसको कहा कि जब कोई कपि तुमको मारेगा तब समझ जाना कि असुरों का विनाश होगा। लंबे समय तक असुरों के साथ रहने के कारण लंकिनी के मन पर धूल चढ़ गई थी, वायुपुत्र के मुक्के की फूंक से वो धूल उड़ गई।

जब कोई संत आपको भला-बुरा कहे तो लंकिनी को अवश्य याद करें। हनुमान जी के मुक्के से बेहोश होना वैसा ही है जैसे मोबाइल हैंग होने पर हम रिस्टार्ट कर लेते हैं तो बढ़िया चलने लगता है।😂

जय बजरंग बली 🙏


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