युधिष्ठिर को ही स्वर्ग क्यों मिला था?


 परीक्षीत को हस्तिनापुर का साम्राज्य सौंपने के बाद युधिष्ठिर पत्नी और भाइयों के साथ हिमालय की तरफ प्रस्थान करते हैं।

हिमालय पर्वत पार करने के बाद एक एक कर सभी प्राण त्यागने लगते हैं, वह इस प्रकार है-

द्रौपदी- सबसे पहले द्रौपदी के प्राण निकल जाते हैं। युधिष्ठिर ने कहा द्रौपदी के लिए हम पांचों बराबर थे लेकिन वह अर्जुन को ज्यादा चाहती थी इसलिए वह पक्षपात करती थी, इसलिए उसे स्वर्ग पहुंचने से पहले प्रयाण करने पड़े।

सहदेव- अगला नंबर सहदेव का था, सहदेव के गिरते ही युधिष्ठिर ने कहा- सहदेव अपने सभी भाइयों की तरह ही गुणवान था लेकिन उसे अपनी बुद्धिमत्ता पर गौरव और घमंड था सहदेव को लगता था कि कोई भी उससे श्रेष्ठ नहीं है।

अब बाकी बचे लोग मेरु पर्वत की तरफ बढ़ रहे थे। तभी अगला नंबर आया

नकुल- नकुल के प्राण त्यागने के बाद युधिष्ठिर ने कहा- सहदेव की तरह नकुल को भी अपनी सुंदरता का घमंड था इसलिए नकुल भी यात्रा पूरी नहीं कर सका।

अर्जुन- युधिष्ठिर ने अर्जुन के प्रयाण करने पर कहा अर्जुन को यह लगता था कि विश्व में सर्वश्रेष्ठ योद्धा वही है इसलिए वह भी यात्रा नहीं पूरा कर सका।

भीम- अंत में भीम भी अपने एक दुर्गुण के कारण गिर जाते हैं, युधिष्ठिर ने कहा भीम तुम दूसरे के भूख की परवाह किए बिना भोजन करते थे और पेटू थे इसलिए तुम्हें भी प्राण त्यागने पड़े।

अंत में युधिष्ठिर और कुत्ता मेरु पर्वत पर पहुंच जाते हैं, वहां इंद्र से मुलाकात होती है फिर आगे की कहानी आपको पता होगा।

युधिष्ठिर को स्वर्ग क्यूं मिला- युधिष्ठिर धर्म के साथ थे और जुआं भी क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए उन्होंने खेला था। आजीवन उन्होंने धर्म का पालन किया था।

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