सीताजी को चूड़ामणि माता सुमित्रा जी ने विवाह के पश्चात मुँह-दिखाई मे दी थी। इस दिव्य चूड़ामणि की यह विशेषता थी कि जिस नारी के केश-पाश में यह रहेगी, उसका सौभाग्य अक्षत-अक्षय -अखंड रहेगा। उसके स्वामी के राज्य में अकाल-अतिवृष्टि की समस्या नहीं होगी।
इस चूड़ामणि की दिव्यता का ज्ञान होने के कारण ही सीताजी ने रावण द्वारा हरण के समय अन्य आभूषणों के साथ इसे नहीं गिराया था और हनुमानजी को निशानी के रूप में देते समय भी यह भाव रहा होगा कि भौतिक रूप से रावण के अधीन होने के कारण यह चूड़ामणि लंका के सौभाग्य की हेतु बनी हुई थी, जिसका पतन रावण के कुकर्मों के कारण सुनिश्चित था।
इसकी पूरी कथा गीताप्रेस की पत्रिका "कल्याण" के मार्च, 2016 के अंक में मुद्रित "चूड़ामणि" (आचार्य श्री रामरंग जी) से साभार -
महाराज दशरथ मुस्कुराते हुए महारानी कौशल्या से बोले -"सर्वप्रथम महारानी कौशल्या अपना पिटारा खोलेंगी।" महारानी कौशल्या अपने पीछे आती हुई कैकेई का हाथ पकड़कर उन्हें आगे बढ़ाते हुए बोली -"प्रथम मुँह-दिखाई मेरी प्रिय अनुजा तुम करो।"
संकोच में घिरी महारानी कैकेई बोली- "दीदी यह आप क्या कर रही हैं? वरिष्ठतम वरिष्ठ (सबसे बड़ी) से पूर्व कनिष्ठतम कनिष्ठ(सबसे छोटी), नहीं-नहीं। प्रथम अधिकार आपका है।""अच्छा, कनिष्ठा होकर वरिष्ठा को आदेश दे रही है? "
सभी की उत्सुकता चरम सीमा पर थी कि देखें कनिष्ठ महारानी क्या देंगी?
कैकई ने धीरे से ज्योंही जानकी का अवगुंठन (घूंघट) सरकाया उनके नेत्र सौंदर्य-सिंधु की सीमा-जैसे उस सहस्त्रदल कमल के सुगंधाकुल भ्रमर बनकर रह गए। विदेह-नंदिनी (सीताजी) के मुख-मंडल ने विदेहराज की संबंधिनी (कैकेई) को विदेही (शरीर की सुध ना रहना) बना दिया।
महारानी कैकेई ने अयोध्या के सुंदरतम भवन "कनक भवन" की रत्न जड़ित कुंजिगुच्छिका धीरे से अपने आंचल से खोलकर जानकी जी के आंचल में बांध दी। यह देखते ही भगवती अरुंधती बोली, "महारानी! अपना कनक भवन दे डाला। यह क्या.....?"
महारानी कैकेई - "महादेवी! महाराज ने इस भवन का निर्माण कनिष्ठ महारानी के लिए कराया था, जिसे आशुतोष भगवान की कृपा अब वरिष्ठा बना रही है। वह उसमें निवास करे तो क्या अन्याय नहीं होगा? अब इस कनक भवन की कनकांगी स्वामिनी आ गई है तो उसकी रक्षिका को उसे समर्पित कर देना ही धर्म है। मैंने उसी का निर्वाह इस आशा-आकांक्षा से किया है कि कल मैथिली भी अपनी वधू को इसी प्रकार से आशीष प्रदान करें।"चरण वंदना करती हुई जनक नंदिनी को अनेकानेक आशीर्वाद देती हुई महारानी कैकेई लौट गई। महाराज के पुनः संकेत पर महारानी कौशल्या ने अब हाथ पकड़कर महारानी सुमित्रा को बढ़ा दिया। जन-जन की उत्सुकता को बढ़ाते हुए सुमित्रा बढ़ चली। कनक-भवन के पश्चात अयोध्या में ऐसी कौन सी अमूल्य वस्तु रह गई है जिसे महारानी सुमित्रा भेंटकर महारानी कैकेई से अधिक सुयश की पात्रा स्वयं को सिद्ध करने में सक्षम होगी।
महारानी सुमित्रा बढ़कर जानकी के सामने जा बैठीं। तनिक-सा अवगुंठन हटाकर मुख देखते ही, एक बार तो कैकेई के समान भाव-समाधि में जाने को बाध्य होते-होते उन्होंने स्वयं को संभाल लिया। धीरे से अपने जूड़े से निकालकर चूड़ामणि जानकी जी के जूड़े में लगाकर लौट आई।
"चूड़ामणि! केवल चूड़ामणि मंझली महारानी ने दी। कैसी कृपण हैं।" कहीं से ये शब्द धीरे से कानों में आते ही महर्षि वसिष्ठ बोल पड़े -"अरे, चूड़ामणि, यह केवल चूड़ामणि, नहीं। केवल अयोध्या के नहीं, विश्व भर के समस्त आभूषण मिलकर भी इस चूड़ामणि की समानता नहीं कर सकते। जो इसका इतिहास नहीं जानते वे ही ऐसा कह रहे हैं।
इस चूड़ामणि की समता केवल श्रीमन्नारायण की ह्रदय-भूषण कौस्तुभ मणि ही कर सकती है। इसका इतिहास सुनो -
"देवों और दानवों ने अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन जिस प्रकार किया, उस कथा से सभी परिचित हैं। सर्वप्रथम कालकूट महाविष निकला। उसके पश्चात गजराज ऐरावत, उच्चैश्रवा अश्व, कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि के क्रम में भगवती महालक्ष्मी से पूर्व रंग-रूप में उन्हीं के समान एक अपूर्व सुंदरी रत्नाकरनंदिनी प्रकट हुई। तपस्या के लिए विदा होते हुए उन्होंने अपने केश-पाश से निकालकर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य रत्नजड़ित यह चूड़ामणि जो उन्हें उनके पिता समुद्र ने धरती पर प्रकट होते समय दी थी, वह उन्होने श्रीहरि को भेंट कर दी। अपने समीप खड़े देवराज की लालायित दृष्टि देखकर उन्होंने वह उन्हें दे दी।
प्रसन्नचित्त देवराज ने देवराज्ञी के जूडे में उसे स्थापित कर दिया। देव शत्रु शंबरासुर का रण में वध कर महाराजा दशरथ, महारानी कैकेई के साथ सदेह देवलोक पधारे। देवराज ने उनका अभिनंदन करते हुए स्वर्गगंगा मंदाकिनी के दिव्य हंसों के पंख उन्हें भेंट किए। वे ही महाराजा ने वर यात्रा के समय अपने चारों राजकुमारों की कलगियों में सजाए थे। इसी अवसर पर देवराज्ञी इंद्राणी ने यह चूड़ामणि महारानी को भेंट करते हुए कहा कि जिस नारी के केश-पाश में यह दिव्य चूड़ामणि रहेगी, उसका सौभाग्य अक्षत-अक्षय -अखंड रहेगा। उसके स्वामी के राज्य में अकाल-अतिवृष्टि की समस्या नहीं होगी।"महारानी कैकेई ने अयोध्या आकर यह चूड़ामणि ज्येष्ठ महारानी को समर्पित कर दी। उन्होंने यह विचारकर कि कनिष्ठा कैकेई को तो महाराज का सर्वाधिक स्नेह प्राप्त हो रहा है उसी प्रकार मुझे प्रजा का सम्मान मिल रहा है किंतु यह मध्यमा महारानी सुमित्रा तो रात दिन परिवार के प्रत्येक कर्म में उनके सुख सुविधा के ध्यान में लगी रहती है। अतः चूड़ामणि की वास्तविक अधिकारिणी ये ही है। इनका और हमारा सौभाग्य एक ही है, यह विचार कर चूड़ामणि उन्हें भेंट कर दी। अब इस नववधू जनक नंदिनी के सौभाग्य को ही वात्सल्यवश अपना सौभाग्य मान्य करते हुए यह चूड़ामणि इन्हें भेंट की है। इसकी समानता करने की क्षमता विश्व भर के किसी आभूषण में नहीं है। मंझली महारानी देवी सुमित्रा कृपा की मूर्ति है। इन पर कृपणता का आरोप लगाना श्री हरि की कृपा से वंचित होना ही है।
महर्षि वशिष्ठ के मौन होते ही महाराज दशरथ धीरे से मुस्कुराते हुए महारानी कौशल्या से बोले - "तुमसे कनिष्ठ हमारी कोई अन्य महारानी हो तो उसका भी अनुसंधान कर उसे आगे बढाइए। उसके पश्चात ही तो आपका मुंह दिखाई का मुहूर्त आएगा।"
महारानी कौशल्या जनक दुलारी की ओर बढ़ चली। धीरे से जानकी का छोटा सा अवगुंठन उठाकर हर्षातिरेक में निकट खड़े राम का हाथ थामकर जानकी के हाथ में देते हुए बोली- "तुम्हारी दोनों सासों की समता करने की क्षमता तो मुझ में नहीं है। तुझ सुवर्णा को भेंट करने के लिए यही श्यामला, जो मेरे अंतःस्थल का समग्र कोश है, वही तुझे भेंट कर रही हूं। ले इसे संभाल, और मुझे पगछुआई में मुक्ति प्रदान कर।"
कहती हुई ज्यों ही महारानी लौटने को हुई, जानकी उनके चरणों में लोट गई। सुस्नेहमय हाथ उनके शीश पर फेरते हुए वे स्वयं को संयमित करते हुए अपने आसन पर आकर बैठ गई।
"बड़ी महारानी वास्तव में बड़ी महारानी सिद्ध हो गई।" कहते हुए महर्षि वशिष्ठ देवी अरुंधति के साथ अपने आश्रम को चले गए।
यदि तीनों माताओं द्वारा दी गई मुँह-दिखाई को एक साथ देखा जाए तो माता कैकेई ने उनके पास जो सर्वोत्तम लौकिक-भौतिक वस्तु थी, कनक भवन वह प्रदान किया। माता सुमित्रा ने उनके पास जो सर्वोत्तम लौकिक सौभाग्य (अभौतिक) था, चूड़ामणि वह प्रदान की। लेकिन माता कौशल्या ने अपना लौकिक (राम पुत्र रूप में) और अलौकिक (राम ईश्वर रूप में) सर्वोत्तम जो उनके पास था, वह प्रदान किया।
वात्सल्य और भक्ति का ऐसा समायोजन तो माता कौशल्या ही कर सकती हैं।

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