क्या राजा युधिष्ठिर पहले स्वयं को हारकर द्रोपती को दांव पर लगा सकते थे?


 युधिस्ठिर के बारे में कुछ गलतफहमियां हैं

1.उनको चौसर का शौक था पर लत नही थी। इतिहास गवाह है कि राजा को जिस भी चीज़ का शौक होता है उसके राज्य में वो फलती-फूलती है। जैसे मोदी जी को स्वच्छता की आदत है तो 2014 के बाद भले और कुछ हुआ हो या नही, पर पूरे देश मे साफ-सफाई की जागरूकता बढ़ी है। गांधी परिवार भृष्ट था तो सरकारें भी भृष्टाचार करती थी। महाभारत में इस बात का कोई जिक्र नही है कि इंद्रप्रस्थ में लोग चौसर खेलते थे,अगर युधिस्ठिर को इसका व्यसन होता तो खूब जुआघर बनते।

2. वो धृतराष्ट्र को पिता समान मानते थे इसलिए उनकी आज्ञा से द्युत खेलने बैठे थे। इसके पहले भी वो धृतराष्ट्र के कहने पर वारणावत गए थे और उसी के कहने पर खांडवप्रस्थ स्वीकार किया था। इस बात पर बहस हो सकती है कि धृतराष्ट्र की ये सारी आज्ञा माननी चाहिए थी या नही पर युधिष्ठिर को व्यसनी जुआरी मानना गलत है।


उस समय पितृसत्तात्मक समाज था, घर के मुखिया (पुरुष) का पूरे परिवार पर अधिकार माना जाता था। इसी अधिकार से युधिष्ठिर ने अपने चार भाइयों को भी दांव पर लगाया था।फिर खुद को हारे फिर द्रौपदी को हारे।

पत्नी पति की संपत्ति होती है इस बात को द्रौपदी ने भी चुनौती नही दी।

पर उन्होंने कुछ बहुत ही तार्किक प्रश्न उठाये

1. जब युधिस्ठिर खुद को हार गए तो वो दास हो गए जबकि द्रौपदी तब स्वतंत्र थी। क्या एक दास किसी स्वतंत्र व्यक्ति को दांव पर लगा सकता है?? इसका उत्तर दिया गया कि पति के दास बनते ही पत्नी भी अपने आप दासी बन जाती है।

2. फिर द्रौपदी ने कहा कि अगर युधिस्ठिर के दास बनते ही द्रौपदी भी अपने आप हार कर दासी बन गई तो वो फिर से दांव पर कैसे लगी?? ऐसे तो हर हारी हुई चीज को दोबारा दांव पर लगाकर अंनत काल तक द्युत खेलते रहिए। इसका कोई उत्तर नही मिला।

3. अर्जुन के दास बनते ही उसकी पत्नी सुभद्रा भी दासी हो गई, उसको भी सभा मे लाकर अपमानित करो( द्रौपदी जानती थी कि सुभद्रा अपने भाई कृष्ण और बलराम की लाडली थी, उसका अपमान करने की हिम्मत किसी की नही थी। वो सिर्फ कृष्ण-बलराम के नाम से कौरवों को डरा रही थी)।

अधर्मियों की सभा मे इन प्रश्नों के उत्तर किसी के पास नही थे।इसलिए महाभारत के युद्ध में भीष्म,द्रोण, कर्ण,दुर्योधन जो भी छल-कपट से मरे सब उनके ही पापों का फल था !! उनसे किसी प्रकार की सहानुभूति नही होनी चाहिए।

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