दरअसल, जब हम भगवान की लीलाओं को पढ़ते और सुनते हैं तो हमें कई अचरज़ भरी बातों का सामना करना पड़ता है। हम विचारों में खो जाते हैं और शास्त्र बनाये ही इसलिए गए हैं ताकि मनुष्य विचारवान बने। इसलिए, आपका यह सवाल की एक ही समय में एक से अधिक अवतार कैसे उपस्थित हो सकते हैं, काफी तार्किक है।
जब हम वेद-अध्ययन करते हैं तो हमें भगवान के कई गुणों के बारे में बताया जाता है। दुर्भाग्यवश, आज के समय में हम वो सारे गुण न ही जान पाते हैं और न की हमें एक उचित शिक्षक मिलता है। इसी वेद-अध्ययन से हमें पता चलता है कि भगवान के पास एक अनोखी शक्ति है जो बड़े बड़े योगियों के लिए एक असंभव कार्य है।
भगवान स्वयं की अनगिनत प्रतिलिपियाँ बना सकते हैं जिसमें कोई भी प्रतिलिपि किसी से कम शक्तिवान नहीं होगी। हर प्रतिलिपि का एक ख़ुद का व्यक्तित्व, ख़ुद की सोच और ख़ुद के गुण होते हैं। और ऐसा भगवान ने अनगिनत बार किया है।
शास्त्रों में लिखा है कि एक महायोगी ख़ुद की आठ प्रतिलिपियाँ बना सकता है, लेकिन भगवान के लिए इस शक्ति की कोई सीमा नहीं है। श्रीमद-भागवतम में बताया गया है कि भगवान श्री कृष्ण अपने सोलह हज़ार एक सौ आठ (16,108) प्रतिलिपियाँ बनाते हैं और हर एक रानी के साथ रहते हैं। जब नारद जी ये देखते हैं तो अचरज़ में पड़ जाते हैं।
इसी प्रकार, ब्रह्मा-विमोहन लीला में भगवान श्री कृष्ण स्वयं की कई प्रतिलिपियाँ बनाते हैं। ब्रह्मा जी विमोहित हो कर ये भूल जाते हैं कि श्री कृष्ण ही श्री विष्णु हैं और भगवान कृष्ण की परीक्षा लेने के लिए उनके मित्रों और पशुओं का हरण कर लेते हैं। भगवान कृष्ण, इस पर, स्वयं की कई प्रतिलिपियाँ बनाते हैं जो की फिर उनके मित्रों, उनके पशु एवं वृंदावन के अन्य बच्चों का रूप ले लेती हैं। जब ब्रह्मा जी देखते हैं कि कृष्ण के मित्र और पशु तो अभी भी भूलोक में हैं और कृष्ण के साथ खेल रहे हैं, तो वो आश्चर्यचकित हो जाते हैं। फिर भगवान कृष्ण, उन्ही प्रतिलिपियों को विष्णु रूप में परिवर्तित कर देते हैं जिससे ब्रह्मा जी को परम सत्य का ज्ञान होता है।

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