जब हनुमान जी लंका, माता सीता के पास पहुँचे तो उन्होंने खुद को बहुत छोटा बना रखा था ..
माता सीता में उनसे पूछा कि तुम कौन हो ???
हनुमान जी ने जवाब दिया
"राम दूत मैं मातु जानकी/सत्य शपथ करुणा निधान की।"
हे! माता मैं प्रभु राम के चरणों की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मैं केवल एक रामदूत हूँ !! इससे ज्यादा मेरा कोई परिचय नही है…
अब उन्होंने डींग नही हाँकी कि लंकिनी को एक ठूंसा मराया, सुरसा को हराया .. बस केवल इतना बताया कि मैं प्रभु का एक सेवक भर हूँ..
हनुमान जी आगे कहते हैं बस आप धैर्य धरें जल्दी ही प्रभु राम अपनी सेना सहित आएंगे और रावण को हराकर, आपको लेकर जाएंगे।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा, कपिन्ह सहित आइहैं रघुवीरा!!
फिर माता सीता ने एक पंक्ति और कही "हैं कपि सब तुम्हाहि समाना"
मतलब सब तुम्हारे तरीके ही हैं .. अर्थात छोटे छोटे ???
फिर माता ने कहा "मोरे हॄदय परम् संदेहा"
बड़ा सन्देह है इस बात में .. कि तुम जैसे लोगों की सेना के साथ प्रभु कैसे लड़ेंगे इन राक्षसों से ??
फिर हनुमान जी ने "कनक भूधराकार सरीरा"
मतलब एकदम भयंकर शरीर धारण किया …कि उतने छोटे भी नही हैं जितना आप समझ रही हैं…!!
बस अभी आर्डर नही है आपको साथ ले जाने का .. क्योंकि प्रभु आएंगे।
पर यहाँ एक सीख है … हनुमान जी ने माता जी का डर दूर करने के लिए देह को बड़ा किया या अपनी शक्ति दिखाई, पर लोग दूसरों को डराने के लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं…
इससे सुंदर प्रसंग मुझे नही मिलता कहीं भी …

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